शनिवार, फ़रवरी 27, 2010





रंगों का त्योहार मुबारक हो।


खुशियों की फुहार मुबारक हो।


सात रंग से सजे आपका तन-मन जीवन।


एक नहीं,दो नहीं ,सौ बार मुबारक हो।

नव संवत और होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
- उमेश पाठक

सोमवार, फ़रवरी 08, 2010



उमेश पाठक -
मित्रो, आज काफी दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा हूं ,सच तो ये है की "रोजी-रोटी की चकरघिन्नी" से वक्त थोडा निकालना मुश्किल हो जाता है! बहरहाल ....बचपन की सुनी-पढ़ी कुछ कविताओं की पक्तियां जो कभी हममें जोश भर देती हैं तो कभी आत्मविश्वाश ! आज आप सभी के लिए दो ऐसी ही कवितायेँ पोस्ट कर रहा हूं !इनको पढ़े -पढाएं,सुने-गुनें और कुछ प्रेरणा प्राप्त करें !पहली कविता हरिवंश राय बचन जी की है तो दूसरी ओजपूर्ण कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की है !


लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती.....
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चदाती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का बिस्वास रगो में साहस भरता है
चदकर गिरना गिरकर चदना न अखरता है
मेहनत उसकी हरबार बेकार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
दुबकियाओं सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खालीहाथ लौटकर आता है
मिलाते न सहज ही मोती गहरे पानी में
बदता दूना बिश्वास इसी हैरानी में
मुद्ठी उसकी खाली हरबार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद चेन की त्यागों तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
- हरिवंश राय बच्चन


झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी
थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
।कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार ,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
-सुभद्रा कुमारी चौहान

शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

नया साल और नयी चुनौतियाँ

नये साल का आगाज हो चुका है इसके साथ ही नयी चुनौतियां भी हैं इस नये साल में देश के सामने भी और पूरे विश्व के सामने भी। साल दो हजार नौ मे जहां मंदी की मार हर तरफ दिखायी पड़ी वहीं विश्व की सबसे मजबूत समझी जाने वाली अमेरिकी और जापानी अर्थव्यवस्था धरासायी होती दिखी। बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय बैक डूब गये।साल के अन्त में दुबई की रियल स्टेट कंपनी अल खलील के दिवालिया होने से भी लाखों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी।मंदी की मार यूरोप से लेकर अमेरिका और एशिया तक दिखी। बैंक दिवालिया हुये कंपनियां डूबी और लाखों लोगों की नौकरी भी चली गयी।लेकिन एशिया की दो मजबूत आर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन नें इस मंदी का ना केवल सामना किया बल्कि पूरे विश्व को मंदी से लड़ने की ताकत भी दी।मंदी की मार से क्या विश्व उबर पायेगा इस नये साल में। साल दो हजार दस मे दस का दम क्या मंदी की छाया से पूरी दुनिया को मुक्त कर देगा ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज पूरी दुनिया का हर अर्थशास्त्री ठूंठ रहा है।मंदी के बादल छंटने लगें है इस बात पर अभी भी वो पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पा रहें हैं।आज भी जापान और अमेरिका मंदी से कराह रहें है। हालात कुछ अच्छें हैं तो वो चीन और भारत की बदौलत जहां की लगभग ढाई अरब की जनसंख्या वस्तुओं के उपभोग की इतनी आवश्यकता पैदा करते है जो किसी भी मंदी का डटकर सामना कर सकते हैं।आज विश्व में सबसे ज्यादा उपभोक्ता यहां निवास करते हैं।लिहाजा मंदी के बाद भी विकास की संभावनायें मौजूद हैं और जो उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को भी बनाये हुये है।यहां के शेयर बाजार रोज नईं उंचाईया छू रहें हैं। शेयर बाजार के कुलांचे ने लोगों के चेहरे पर जहां मुस्कराहट वापस लौटाई है। वहीं सोने और चांदी की रोज तेज होती चमक ने इनको आम आदमी से दूर कर दिया।बाजार में इस तेजी के बाद के बाद भी ,इस तेजी भर भरोशा नहीं किया जा सकता। बाजार की यह तेजी मृग मरीचिका की तरह आकर्षित करती दिखायी पड़ती है। जिसकी हकीकत शायद कुछ और है क्योंकि शेयर बाजार की यह चमक बाजार की उठा-पटक में अक्सर आम आदमी को लूटती दिखायी पड़ती है, बाजार की तेजी में वो स्थिरता अभी नहीं पायी है जिससे आम आदमी का भरोसा बाजार पर फिर से बन सके।तमाम संभावनाओं और आशंकाओं के बीच मंदी के इस दौर में भी देश के आम आदमी का निवाला जहां मंहगा हो गया वही नये साल के स्वागत में मुबंई में लोगों ने एक सौ साठ करोड़ की शराब पैमानों में डालकर अपने गले को तर कर डाला।राजधानी दिल्ली मे भी जाम के शौकीनों ने लगभग सौ करोड़ रूपये अपने इस शौक पर नये साल के जश्न पर बहा दिये।फिलहाल इन सब के बाद भी देश का बैंकिंग सेक्टर मजबूती से खड़ा है वहीं रियल स्टेट भी धीरे-धीरे ही सही एक बार फिर से अपने पैर पर मजबूती से खडा़ होने का प्रयास कर रहा है।उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ रही है।आटोमोबाइल सेक्टर भी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगा है. देश में छोटी बजट कार से लेकर मंहगी गाड़ियों के शौकीनों मे तेजी से बृद्धि हुयी है। साल के अन्त में सस्ती से लेकर मंहगी कारो तक की बिक्री में रिकार्ड बढ़ोत्तरी देखने को मिली।टाटा की नैनो से लेकर लैण्ड रोवर तक को लोगों ने खासा पसंद किया जब सारा विश्व मंदी से डूबा था भारत में मर्सडी़ज से लेकर फोर्ड टोयटा आडी सहित इस क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने सस्ते से लेकर मंहगी कारों के नये माडलों को बाजार मे उतारा जो अपनेआप भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था की कहानी कहता है।मंदी और बाजार की मजबूती के बीच में आम आदमी पिसता ही रहा है।ये बात अलग है कि विदर्भ का गरीब किसान हो या उत्तर प्रदेश के वुन्देलखण्ड का।उस पर मंदी के आने और जाने कोई असर नहीं

पड़ा। वो मंदी के पहले भी आत्महत्या कर रहा था और आज भी कर रहा है। देश को मंदी से बचाने के लिये सरकार ने बाजार में जहां करोड़ रूपये डाले और तरह-तरह के राहत पैकेज दिये लेकिन वहां के किसानों को पहले की तरह आज भी मिल रहा है मौत का पैकेज गरीबी का पैकेज आंसुओं का पैकेज भूखे पेट का पैकेज ओर झूठे आश्वासनों का पैकेज।फिलहाल आशा और विश्वास पर दुनिया कायम है ।हम उम्मीद कर सकते है इस नये साल में दस का दम हर तरफ दिखेगा। खास की जगह आम आदमी का जीवन हो या अर्थव्यवस्था हर तरफ तेजी का रूख देखने को मिलेगा।इस नये साल में शायद सरकार के साथ-साथ समाज और उद्धोगपति भी देश के किसानों के दुख दर्द को साझा कर सकेंगें।उम्मीद की इस लौ को जलाये रखे यह साल तो शायद देश से लेकर परदेश के लिये भी अच्छा होगा।हमारा बजाज के नारे के साथ स्कूटर को छोड़ कर मोटर साइकिल और कार की सवारी कर रहे इस मुल्क के लोगों की भी यही उम्मीदे है।

- विनीत त्रिपाठी,टी.वी.पत्रकार

शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

प्रभाष जोशी का जाना !


हिंदी के जाने-माने पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन हो गया है.

वर्षों से हिंदी अख़बार जनसत्ता से जुड़े रहे प्रभाष जोशी को गुरुवार की रात दिल का दौरा पड़ा था. गुरुवार रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

प्रभाष जोशी 73 वर्ष के थे. उनके परिवार में उनकी पत्नी, उनके दो बेटे और एक बेटी है.

हिंदी अख़बार नई दुनिया से पत्रकारिता करियर शुरू करने वाले प्रभाष जोशी उस समय ज़्यादा सुर्ख़ियों में आए, जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के हिंदी अख़बार जनसत्ता के संस्थापक संपादक की कुर्सी संभाली.

अपनी धारदार लेखनी और बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर प्रभाष जोशी अपने क्रिकेट प्रेम के लिए भी चर्चित थे.

राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों के अलावा क्रिकेट पर भी उनका लेखन ज़बरदस्त था. जनसत्ता में नियमित छपने वाला उनका कॉलम कागद कारे भी काफ़ी लोकप्रिय था.

जनसत्ता

1983 में उन्होंने जनसत्ता के संपादक का काम संभाला था. इस अख़बार से उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की दिशा बदल कर रख दी. प्रभाष जोशी के नेतृत्व में जनसत्ता में प्रतिभाशाली पत्रकारों की एक पूरी फौज थी.

जनसत्ता ने उन दिनों न सिर्फ़ राजनीतिक गलियारों में अपनी पैठ बनाई बल्कि अपनी सीधी, सहज लेकिन धारदार भाषा की वजह से आम लोगों का भी दिल जीता.

वर्ष 1995 में प्रभाष जोशी जनसत्ता के संपादक के पद से रिटायर हो गए लेकिन इसके बाद भी वर्षों तक वे जनसत्ता के संपादकीय सलाहकार के रूप में काम करते रहे.

मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले प्रभाष जोशी ने इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक के रूप में अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली में काम किया था.

गुरुवार, अक्टूबर 15, 2009

दीपावली की शुभकामनाएं !


पूरी हो हर बात जो दिल में आपने पाली हो!
मंगलमय
हम सबकी हर बार दिवाली हो !
असतो माँ सद गमय ,अर्थात अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो!अंधकार और प्रकाश जो सत्य और असत्य के प्रतीक हैं,इनको मान कर हम दीपावली को सत्य की असत्य पर विजय के रूप में मनातें हैं!बचपन से आज तक हम इस पर्व को मनाते रहें हैं जिसमे दीप जलना मिठाई बाँटना (मिठाई के साथ पहले प्रेम भी शामिल हुआ करता था ) शामिल है! मगर आज इस पर्व के मायने भी बदलते नज़र रहें हैं !मिठाई के डबे जहाँ दिखावे के प्रतीक होते जा रहें हैं वहीँ प्रेम भी पैसे और दिखावे के बीच कहीं दब गया है !हम सब आज बाज़ार की गिरफ्त में हैं जहा शुभकामनायें भी बाजार का हिस्सा हैं!( ब्रांडेड ग्रीटिंग कार्ड्स के रूप में ) ऐसे परिवेश में स्वयं को सँभालते हुए मै आप सभी को इस प्रकाशपर्व की शुभकामनाएं देता हू ! - उमेश पाठक

शुक्रवार, अक्टूबर 09, 2009

उधार की शहरी जिंदगी


- उमेश पाठक
यू
तो सबकी जिंदगी जीने के अपने तरीके होते हैं और हर आदमी अपने हिसाब से ही जीता है लेकिन शहरी जिंदगी का अपना अलग ही रूप है ! इस भौतिक युग में जहा आम आदमी दाल -रोटी से जूझ रहा है वहीँ शहरी मध्य वर्ग अपनी आवश्यकताओं /उपभोग की वस्तुओं के लिए अपनी जिंदगी किश्तों (इंस्टालमेंट ) के नाम किए हुए है ! लोगों की एक बड़ी संख्या है जो किसी किसी लोन मसलन कार/घर आदि का किश्त भरने में लगी है !ये वो लोग हैं जो अपना आने वाला १०-२० साल इसी उधारी के नाम कर चुकें हैं!वे चाहें या चाहें उन्हें इन किश्तों के लिए काम करना ही होगा ! मतलब ये की वर्तमान तो वर्तमान ,भविष्य भी उधार है ,उस पर हमारा कोई बस नही(जब तक किश्त पुरा न हो जाए ) यानि अगले दस-बीस साल की जिंदगी उधार की है !
पुराने ज़माने में साहूकारों ने जो काम किया था आज वही काम विभिन्न कम्पनियां कर रही हैं! साहूकार जहा ज़रूरत पर धन उपलब्ध करते थें ये कम्पनियां अपने उत्पाद/वस्तुएं दे रहीं हैं ! गौर से देखें तो यह उसी सहकारी का बदला हुआ रूप है जो हमें प्रेमचंद की कहानियो में दिखता है !शोषण यहाँ भी है लेकिन छद्म रूप में /छिपा हुआ जिसे सभी लोग आसानी से नही समझ पातें! योजना स्टाक रहने तक और आकर्षक ऑफर के पीछे के कंडीसन अप्लाई या शर्तें लागू का सच तो बाद में उजागर होता है !
महात्मा गाँधी ने कहा था "हमें संसाधनों का कम से कम प्रयोग की आदत डालनी चाहिये ,जिससे सभी लोगों की आवश्यकता की पूर्ति हो सके!"आज स्थिति इसके ठीक विपरीत है !हम सभी लोग अपनी आवश्यकता बढ़ने में लगें हैं! जाहिर है किसी न किसी की ज़रूरत तो बाधित होगी ही !इसका ये मतलब नही है की हम चीजों का उपभोग न करें लेकिन जहाँ तक संभव हो सके कम उपभोग/प्रयोग तो कर ही सकते हैं और अपना जीवन बिना किसी के दबाव के जी सकतें हैं !उधार की जिंदगी से बचने का अन्य कोई रास्ता नही है!इसी जीवन में सच्चा सुख है ,ये उधार की वस्तुएं हमें सच्चा सुख नही दे सकती बल्कि एक प्रकार की पराधीनता का ही एहसास कराती हैं!

सोमवार, सितंबर 28, 2009

भगवती चरण वर्मा :व्यंग-चित्र के सफल चितेरे !

हिन्दी साहित्य में यू तो एक से बढ़ कर एक नाम हैं ,मगर जिस सहजता के साथ भगवती चरण वर्मा गुदगुदा कर व्यंग का तीर छोड़ते हैं ,वह बहुत कम देखने को मिलता है!"वसीयत "उनकी ऐसी ही एक कालजयी रचना है!वसीयत के अलावा सबही नचावत राम गोसाई भी उनकी कलम की तेज़ धार की पैनी कृति है !वर्मा जी केवल सामयिक पात्रों का चयन करते हैं,बल्कि उनके संवादों में भी लोकभाषा या उस कल-युग का विशेष ध्यान देतें हैं !अपने विषय के साथ गंभीर संदेश के लिए भी उनकी रचनाएँ प्रासंगिक हैं !
वसीयत में पंडित चूडामणि के पात्र को कोई कैसे भूल सकता है,सांसारिक रिश्तों-संबंधों के पीछे छिपी सच्चाई और मनुष्य के लालची मन का हिन्दी में ऐसा चित्रण कहीं अन्य देखने को नही मिलता !