मंगलवार, अप्रैल 06, 2010

एक बोध कथा


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब
कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम
पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती
है ।

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे
आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और
उसमें टेबल
टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने
की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...
आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु
किये उन्होंने धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा
गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर
हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी
में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी
नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई
ना ? हाँ ! अब तो पूरी भर गई है सभी ने एक स्वर में कहा ॥ सर ने टेबल के नीचे से
चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित
थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार ,
बच्चे , मित्र
, स्वास्थ्य और शौक हैं ,

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और

रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की
गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो
गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे
पडे़ रहोगे
और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय
नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने
बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस
गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ...... पहले तय करो कि
क्या जरूरी
है ... बाकी सब तो रेत है ..

छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ... अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह
नहीं बताया
कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही
रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...

इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन
अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

( अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो
.... मैंने अभी - अभी यही किया है:साभार मित्र हरीश कुमार )

रविवार, अप्रैल 04, 2010

दर्दों का एक जखीरा सैलाब बन गया !


(हर इंसान के दिल में कुछ कुछ अनुभूतियाँ होती हैं और वह उसे किसी किसी रूप में व्यक्त करने की कोशिश करता है ......लीजिये एक ईमानदार कोशिश ,आपके सामने प्रस्तुत है ) - उमेश पाठक

दर्दों का एक जखीरा सैलाब बन गया !
जी लेंगे,खुश रहेंगे बस खाब बन गया!
दुशवारियां यू बढ़ गयीं हयात की मेरी,
बादल जो था ख़ुशी का वो आब बन गया !
होटों पे हंसी मेरे ,पलकों में छुपे आंसू
ये दर्द भी अब देखो नायाब बन गया !
गमगीं कोई हो ,मुझसे ये हो न पाया यारों ,
खुद दर्द मेरे ज़ख्म का ज़वाब बन गया !
कुछ जोड़ना घटाना ,फितरत नही थी मेरी,
घाटे में जिंदगी का हिसाब बन गया !

मंगलवार, मार्च 09, 2010

कोई दर्द जो दिल में होता है!



-उमेश पाठक

चेहरे से बयां हो जाता है,अफसाना जो दिखता है,
कोई ग़मगी हो चुप रहता है ,कोई दर्द की गजलें लिखता है,
कही कोई आहें भरता है ,कही कोई गुमसुम रोता है,
कोई दर्द जो दिल में होता है,
कोई दर्द जो दिल में होता है!

भूली बिसरी सी चाहो में ,जेहन की पुरानी राहों में,
उखड़ी-उखड़ी सी सांसों में ,कुछ भूले हुए एहसासों में ,
दामन अश्कों से भिगोता है,कोई दर्द जो दिल में होता है !

दिल के अपने जज्बातों से, माजी की पुरानी रातों से ,
अरसे पहले जो गुजर चुकीं ,धुंधली सी उन मुलाकातों से,
खाबों में तासुब्बुर में ही सही,कोई मिल के गले तब रोता है!

कोई दर्द जो दिल में होता है, कोई दर्द जो दिल में होता है!






शनिवार, मार्च 06, 2010

कुछ दूर हमारे साथ चलो ...


कुछ दूर हमारे साथ चलो ,
हम दिल की कहानी कह देंगे !
समझे ना तुम जिसे आंखों से ,
वह बात जुबानी कह देंगे !

जो प्यार करेंगे जानेंगे ,
हर बात हमारी मानेंगे ,
जो जले नहों खुद उल्फत में ,
वह आग को पानी कह देंगे !

जब प्यास जवाँ हो जायेगी,
एहसास की मंजिल पाएंगे,
खामोश रहेंगे और तुम्हें ,
हम अपनी कहानी कह देंगे

इस दिल में ज़रा सा झांको तों,
कुछ हाल हमारा पूछो तों ,
हम सदा-सदा दिल ही में हैं ,
हर बात पुरानी कह देंगे!


जो लफ्ज लबो पर सकें,
हम हाल तुम्हें बतला सकें,
एक बार नज़र भर के देखो,
नज़रों की ज़ुबानी कह देंगे !

कुछ दूर हमारे साथ चलो ,
हम दिल की कहानी कह देंगे !


-उमेश पाठक

शनिवार, फ़रवरी 27, 2010





रंगों का त्योहार मुबारक हो।


खुशियों की फुहार मुबारक हो।


सात रंग से सजे आपका तन-मन जीवन।


एक नहीं,दो नहीं ,सौ बार मुबारक हो।

नव संवत और होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
- उमेश पाठक

सोमवार, फ़रवरी 08, 2010



उमेश पाठक -
मित्रो, आज काफी दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा हूं ,सच तो ये है की "रोजी-रोटी की चकरघिन्नी" से वक्त थोडा निकालना मुश्किल हो जाता है! बहरहाल ....बचपन की सुनी-पढ़ी कुछ कविताओं की पक्तियां जो कभी हममें जोश भर देती हैं तो कभी आत्मविश्वाश ! आज आप सभी के लिए दो ऐसी ही कवितायेँ पोस्ट कर रहा हूं !इनको पढ़े -पढाएं,सुने-गुनें और कुछ प्रेरणा प्राप्त करें !पहली कविता हरिवंश राय बचन जी की है तो दूसरी ओजपूर्ण कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की है !


लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती.....
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चदाती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का बिस्वास रगो में साहस भरता है
चदकर गिरना गिरकर चदना न अखरता है
मेहनत उसकी हरबार बेकार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
दुबकियाओं सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खालीहाथ लौटकर आता है
मिलाते न सहज ही मोती गहरे पानी में
बदता दूना बिश्वास इसी हैरानी में
मुद्ठी उसकी खाली हरबार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद चेन की त्यागों तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती
- हरिवंश राय बच्चन


झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी
थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
।कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार ,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
-सुभद्रा कुमारी चौहान

शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

नया साल और नयी चुनौतियाँ

नये साल का आगाज हो चुका है इसके साथ ही नयी चुनौतियां भी हैं इस नये साल में देश के सामने भी और पूरे विश्व के सामने भी। साल दो हजार नौ मे जहां मंदी की मार हर तरफ दिखायी पड़ी वहीं विश्व की सबसे मजबूत समझी जाने वाली अमेरिकी और जापानी अर्थव्यवस्था धरासायी होती दिखी। बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय बैक डूब गये।साल के अन्त में दुबई की रियल स्टेट कंपनी अल खलील के दिवालिया होने से भी लाखों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी।मंदी की मार यूरोप से लेकर अमेरिका और एशिया तक दिखी। बैंक दिवालिया हुये कंपनियां डूबी और लाखों लोगों की नौकरी भी चली गयी।लेकिन एशिया की दो मजबूत आर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन नें इस मंदी का ना केवल सामना किया बल्कि पूरे विश्व को मंदी से लड़ने की ताकत भी दी।मंदी की मार से क्या विश्व उबर पायेगा इस नये साल में। साल दो हजार दस मे दस का दम क्या मंदी की छाया से पूरी दुनिया को मुक्त कर देगा ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज पूरी दुनिया का हर अर्थशास्त्री ठूंठ रहा है।मंदी के बादल छंटने लगें है इस बात पर अभी भी वो पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पा रहें हैं।आज भी जापान और अमेरिका मंदी से कराह रहें है। हालात कुछ अच्छें हैं तो वो चीन और भारत की बदौलत जहां की लगभग ढाई अरब की जनसंख्या वस्तुओं के उपभोग की इतनी आवश्यकता पैदा करते है जो किसी भी मंदी का डटकर सामना कर सकते हैं।आज विश्व में सबसे ज्यादा उपभोक्ता यहां निवास करते हैं।लिहाजा मंदी के बाद भी विकास की संभावनायें मौजूद हैं और जो उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को भी बनाये हुये है।यहां के शेयर बाजार रोज नईं उंचाईया छू रहें हैं। शेयर बाजार के कुलांचे ने लोगों के चेहरे पर जहां मुस्कराहट वापस लौटाई है। वहीं सोने और चांदी की रोज तेज होती चमक ने इनको आम आदमी से दूर कर दिया।बाजार में इस तेजी के बाद के बाद भी ,इस तेजी भर भरोशा नहीं किया जा सकता। बाजार की यह तेजी मृग मरीचिका की तरह आकर्षित करती दिखायी पड़ती है। जिसकी हकीकत शायद कुछ और है क्योंकि शेयर बाजार की यह चमक बाजार की उठा-पटक में अक्सर आम आदमी को लूटती दिखायी पड़ती है, बाजार की तेजी में वो स्थिरता अभी नहीं पायी है जिससे आम आदमी का भरोसा बाजार पर फिर से बन सके।तमाम संभावनाओं और आशंकाओं के बीच मंदी के इस दौर में भी देश के आम आदमी का निवाला जहां मंहगा हो गया वही नये साल के स्वागत में मुबंई में लोगों ने एक सौ साठ करोड़ की शराब पैमानों में डालकर अपने गले को तर कर डाला।राजधानी दिल्ली मे भी जाम के शौकीनों ने लगभग सौ करोड़ रूपये अपने इस शौक पर नये साल के जश्न पर बहा दिये।फिलहाल इन सब के बाद भी देश का बैंकिंग सेक्टर मजबूती से खड़ा है वहीं रियल स्टेट भी धीरे-धीरे ही सही एक बार फिर से अपने पैर पर मजबूती से खडा़ होने का प्रयास कर रहा है।उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ रही है।आटोमोबाइल सेक्टर भी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगा है. देश में छोटी बजट कार से लेकर मंहगी गाड़ियों के शौकीनों मे तेजी से बृद्धि हुयी है। साल के अन्त में सस्ती से लेकर मंहगी कारो तक की बिक्री में रिकार्ड बढ़ोत्तरी देखने को मिली।टाटा की नैनो से लेकर लैण्ड रोवर तक को लोगों ने खासा पसंद किया जब सारा विश्व मंदी से डूबा था भारत में मर्सडी़ज से लेकर फोर्ड टोयटा आडी सहित इस क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने सस्ते से लेकर मंहगी कारों के नये माडलों को बाजार मे उतारा जो अपनेआप भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था की कहानी कहता है।मंदी और बाजार की मजबूती के बीच में आम आदमी पिसता ही रहा है।ये बात अलग है कि विदर्भ का गरीब किसान हो या उत्तर प्रदेश के वुन्देलखण्ड का।उस पर मंदी के आने और जाने कोई असर नहीं

पड़ा। वो मंदी के पहले भी आत्महत्या कर रहा था और आज भी कर रहा है। देश को मंदी से बचाने के लिये सरकार ने बाजार में जहां करोड़ रूपये डाले और तरह-तरह के राहत पैकेज दिये लेकिन वहां के किसानों को पहले की तरह आज भी मिल रहा है मौत का पैकेज गरीबी का पैकेज आंसुओं का पैकेज भूखे पेट का पैकेज ओर झूठे आश्वासनों का पैकेज।फिलहाल आशा और विश्वास पर दुनिया कायम है ।हम उम्मीद कर सकते है इस नये साल में दस का दम हर तरफ दिखेगा। खास की जगह आम आदमी का जीवन हो या अर्थव्यवस्था हर तरफ तेजी का रूख देखने को मिलेगा।इस नये साल में शायद सरकार के साथ-साथ समाज और उद्धोगपति भी देश के किसानों के दुख दर्द को साझा कर सकेंगें।उम्मीद की इस लौ को जलाये रखे यह साल तो शायद देश से लेकर परदेश के लिये भी अच्छा होगा।हमारा बजाज के नारे के साथ स्कूटर को छोड़ कर मोटर साइकिल और कार की सवारी कर रहे इस मुल्क के लोगों की भी यही उम्मीदे है।

- विनीत त्रिपाठी,टी.वी.पत्रकार