
-उमेश पाठक
कछुए वाली खोल जिन्दगी,
गले पड़ी सी ढोल जिंदगी !
रोजी -रोटी के सवाल पर,
पढ़ती है भूगोल जिन्दगी
ऊपर से हसती -मुस्काती ,
भीतर पोलमपोल जिन्दगी !
ख़ुद से भी बातें करने में ,
करती टाल-मटोल जिन्दगी !
न जाने कब बीच सफ़र में ,
करे बिस्तरा गोल जिन्दगी !
कछुए वाली खोल जिन्दगी,
गले पड़ी सी ढोल जिंदगी !
गले पड़ी सी ढोल जिंदगी !
kuchh bhee kh le duniya vale
जवाब देंहटाएंdost bina bedaul jindgee .
umesh jee aapkee rchna psnd aayee ,bdhai .
umda !
जवाब देंहटाएंanupam !
achhi lagi____________
bahut khoob likha....
जवाब देंहटाएंkachuye vali khol jindagi,
gale padi si khol jindagi...
क्या बात है !
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